शनिवार, मई 30, 2015

सोशल मीडिया वाले आशिक़







विंडो-ए-चैट में, आया नया बनफूल है,
हाय दिल मचल गया, तो मेरा क्या कुसूर है...

या फिर

मैं तेरा आशिक़ हूँ, तुझसे इश्क़ करना चाहता हूँ,
फेसबुक पर आकर मैं, डूब मरना चाहता हूँ...

या फिर

हम तो चोंचबाज़ हैं, सदियों पुराने,
हाय तू ना जाने, हाय तू ना माने,
हम तो चले आए हैं, तुझको बहकाने,
हाय तू ना जाने, हाय तू ना माने..

या फिर

दिल तो दिल है,
दिल को काबू,
क्या कीजे,
आ गया है,
तुम्ही पर बाबू,
क्या कीजे...

तो मेरे - जॉन जानी जनार्दन दोस्तों यही तो कहानी है आज के युग के ठसबुद्धि, मंदबुद्धि, स्वछंद विचारधारा वाले कुबुद्धिजीवी मनचलों के दिलों की भी।

"अरे...! हमार दिल है तुमसे क्या, तुम पर भी मचल सकता है और देखो तुम्हे भी रेस्पौंड तो करना ही होगा फिर तुम चाहे कोई भी हो, कहीं से भी हो, किसी की भी हो, कोई वांदा नहीं, बस नारी हो ना, यही बहुत है अपने लिए। मैं ना नहीं सुनूंगा - कहे देता हूँ। शीशे में तो तुम्हे मैं उतार ही लूँगा कैसे भी कर के, क्योंकि इतना रसूक और हुनर तो बना ही लिया है यहाँ आकर।"

जी हाँ मेहरबां, बिलकुल यही सोच तैयार हो रही है आजकल के उन नामर्द और दब्बू  सो कॉल्ड सेलेब्रिटी आशिक़ों के बीच जो महिलाओं को सिर्फ भोग की वस्तु मात्र समझते हैं और उनका शोषण करने का कोई भी मौका मिलने पर चूकना नहीं चाहते। फिर चाहे ज़रिया कोई भी क्यों ना हों इन्हें सब मंज़ूर है। शर्म, लाज, हया किस चिड़िया का नाम है? ये इन्होंने कभी ना तो सुना ही है ना इसके बारे में जानते हैं। इनको चौबीसों घंटे सिर्फ एक ही हुड़क लगी रहती है "टूट पड़ो" कैसे भी, कहीं भी - बस मिल जाए कोई। हवस की तलब ऐसे जानवरों के ह्रदय में बड़े गहरे में कुलबुलाती है। देह पाने और भोग करने की कसक इनकी सोचने की शक्ति को कसती जाती है । इन जैसों को बड़ी स्वाभाविक और कुदरती चाहत लगती है यह। कई तरह के विरोधाभासी अभावों के गलियारों में ही इनका दिल किलसता, बिलखता, चहल कदमी करता टहलता रहता है, और भूख का कीड़ा कहीं न कहीं हमेशा दिल-दिमाग में रेंगता ही रहता है। इनकी ख़ुमारी का मकोड़ा इनकी बेमतलब हसरतों की खुजली को इतना खरोंचता है कि उसके निशान गाहे-बगाहे इनकी शक्सियत में उभर ही आते हैं। ऐसे लोगों का समूचा तंत्र-प्रणाली सदा बिगड़ा और हिला ही रहता है। इनकी मानसिकता इनके जीवन पर हावी रहती है और हमेशा इनकी जीवन शैली को काम-भोग की इच्छा से प्रभावित करती रहती है। यह एक तरह के मानसिक रोगी होते हैं क्योंकि इनका मन, अस्तित्त्व, चरित्र, चित्त, बुद्धि, अहंकार, अन्नमय कोष, प्राणमय कोष और सोच कुछ भी इनके वश में नहीं होता। सब कुछ इनके हाथ से निकला हुआ होता है। इनके कामुक स्वभाव के भयंकर मनोविकार के ज़लज़ले में इनके विक्षिप्त व्यक्तित्व की चूलें हिल चुकी होती है। यह एकतरफ़ा आग में जलने वाले होते हैं। ऐसे प्लेटोनिक प्रेमी बड़े ही घातक साबित हो सकते हैं। कोई स्त्री यदि इनसे हंसकर बात कर ले तो इनकी इन्द्रियां तुरंत जागृत हो जाती हैं और यह अपने ही बनाए और बुने सपनो के तरंग-भाव के आवेग और आवेश में उड़ने लग जाते हैं। अपनी ही दलदली सोच में गोते लगाकर इनका पाव-डेढ़ पाव खून भी बढ़ जाता है। इनका एकतरफ़ा सो कॉल्ड रोमांस इनकी नज़र में परवान चढ़ने लग जाता है और यह अपने को उम्दा क्वालिटी का आशिक़ प्रोजेक्ट करने के लिए किसी के भी साथ बातचीत में अचानक से वेटिंग फॉर इट, आई वांट टू किस यू, आई लव यू, किस मी, वांट इट, गोइंग फॉर इट, ईटिंग, ईटन, नाऊ इन्सरटिंग, नाउ एजेक्टिंग और भी बहुत सी बेकार वाली अनाप-शनाप बकर-बकर करने लग पड़ते हैं जिससे इनकी दिमाग़ी कामोत्तेजकता शांत होने का एहसास देती है। आचरण के अनुसार कहें तो ऐसे लोगों के मन को अश्लीलता ने ऐसे कब्ज़ा लिया होता है कि शिलाजीत पे शिलाजीत, वयाग्रा पे वयाग्रा सटके जा रहे होते हैं और फिर भी इनके अन्दर अकाल बना रहता है, सूखी रेत से भरे रेगिस्तान में टहलते घूमते फिरते रहते हैं फिर भी - काम नहीं बनता। अजी हुज़ूर समझ जाइए संस्कृत वाला 'काम' - हिंदी वाला नहीं।...  ;)

मेरा ऐसा मानना है कि ऐसे लोग भीतर से खोखले और शोर करने वाले ढपोलशंख भर होते है। ये सारा जीवन एक मुखौटा पहन कर जीते हैं और ये सारा झमेला, झंझट, अच्छाई का नाटक, नौटंकी बस बिस्तर तक पहुंचने की ही कवायद है। कोई यदि इनसे बात करता है या दोस्त बनता है तो वो अपने मन को और खुद को ही बेवकूफ बनाता रहता है इनके जैसों की दोस्ती के नाम पर। वो समझ नहीं पाता कि यह पाखंड की गहरी साज़िश है, एक मासूम इंसान को बहकाने के लिए और उसकी मासूमियत से खिलवाड़ करने के लिए। मैं यह कहता हूँ कि यदि अंत में यही सब करने की मंशा होती है तो फिर इतना ड्रामा क्यों करते हैं बड़े मियां - जिगरा है तो खुल्लमखुल्ला अभिव्यक्ति कीजिये - इश्क़-रोमांस, अच्छाई-भलाई की बीमारी को एक साइड कीजिये और हिम्मत हौंसले के साथ अपने विचार सबके सामने रखिये। बिलकुल प्यार और दोस्ती की वही ख़ूबसूरत सी बीमारी जो अक्सर पागलपंती में तब्दील हो जाया करती है और जिसकी धज्जियाँ ऐसे लोग अपनी अहमकाना हरकतों उड़ाते हैं, जिन्हें ना तो इश्क़ का मतलब मालूम होता है ना दोस्ती का। असल ज़िन्दगी में तो फिर बड़े ही सड़ियल और अनरोमांटिक नेचर वाले होते होंगे ये - तो काहे बेकार में इतनी शेरो-शायरी करते हैं, कविताबाज़ी करते हैं, दिल जलाते हैं, किताबें छपवाते हैं, गाल बजाते हैं - साला पहले पता हो एंड रिजल्ट ऐसा निकलता है असल में तो इन जैसों को सीधा शुरू से 'बीड़ी जलाइले जिगर से गधे, जिगर मां बड़ी आग है ' और 'कभी कैच किया रे कभी छोड़ दिया रे' सुनकर जुतिया जाए और सर गंजा कर दिया जाए मार-मार कर।

इनके पास माया है, मोहिनी भी और ज़माने के सामने निजी जीवन में ये उनके नटखट हीरो बनकर रहते हैं पर वहीँ इनके भीतर तड़पता रहता है एक बड़ा सा अजगर जो किसी की भी सुन्दर-औसत तस्वीर, गोरी-काली-भूरी चमड़ी, मनमोहक आवाज़, खिलखिलाती हंसी, नव यौवन, मध्य आयु, अधेड़ उम्र की औरत फिर चाहे वो अकेली हो, किसी की बहन, बीवी, बेटी, माँ, भाभी आदि कुछ भी हो को अपने झांसे में लेने की फ़िराक में रहता है, निगलने की मंशा के साथ अपने मद की प्यास में लिप्त, चिपचिपी लार बार-बार, लगातार हर जगह टपकाता रेंगता फिरता है। उसकी निगाहें अपने शिकार को हर पर तलाशती रहती हैं और इसी ताक़ में रहती हैं कब, कैसे, किस तरह उसे अपने चंगुल में जकड़ कर दबोच सके। समाज के बीच वो एक प्रतिष्ठित पुतला बनकर निवास करता है, परन्तु अकेले में वो एक आदमखोर होता है जो सिर्फ औरतों को अपना शिकार बनाता है। आजकल की सोशल मीडिया टेक्नोलॉजी ने ऐसे आदमज़ात भेड़ियों का काम और भी आसां बना दिया है, फिर चाहे लिंक्डइन, फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर आदि कोई भी माध्यम हो महिलाएं बदतमीज़ी, शाब्दिक शोषण, बदसुलूकी, फितरेबाज़ी और भी ना जाने कौन कौन से तरीकों की परेशानी से अछूती नहीं रही हैं। हर पल दस में से नौ गिद्ध उन्हें दबोचने के लिए जाल बिछाए बैठे रहते है। दोस्ती करने के नाम पर अश्लीलता, फूहड़ता, निजी ज़िन्दगी में तांक-झाँक, शारीरिक लिप्सा, मानसिक शोषण और ऐसे ही कितने तरीको से उनकी आत्मा को आहत किया जाता है। कुछ तो यह सब ख़ामोशी से बर्दाश्त कर लेती हैं और कुछ विद्रोह कर ऐसे समाज के सम्माननीय लफंडरों का पर्दाफ़ाश करती नज़र आती हैं। मुझे गर्व होता है उन वीरांगनाओं पर जो ऐसी घटनाओं के पश्चात अपनी आवाज़ बुलंद करती हैं और ऐसे सामाजिक कीड़ों को उनके अंजाम तक पहुंचाती हैं।

यह एक बेहद गंभीर और चिंता का विषय है और मेरा ऐसा मानना है कि इसके लिए हम सबको मिलकर आवाज़ उठानी चाहियें और आगे ऐसी घटनाएँ कम से कम देखने-सुनने में आयें उसके लिए कुछ कड़े कदम उठाने चाहियें। जो लोग महिलाओं के साथ ऐसा अभद्र दुर्व्यवहार करते हैं उनका सोशल मीडिया से तो बहिष्कार करना ही चाहिए, उनका मुंह काला कर खच्चर पर सवारी करा कर, जूतों का हार पहना कर, काँटों से ताजपोशी कर सारे नगर में भी घुमाना चाहियें और ख़ास तौर पर उनके अपने परिवारजन के सामने उनका असली चेहरा लाकर उन्हें सरेआम नंगा करना चाहियें जिनकी आँखों में धुल झोंक कर वो आज तक ऐसे काम करते आए हैं। अभी कुछ समय पहले मैंने ऐसे ही पहलु पर चिंता व्यक्त करते हुए एक कविता का सृजन किया था वो आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ मेरे इस लेख और कविता से कुछ प्रतिशत महिलाओं में तो जाग्रति का संचार होगा और वो अपने साथ होने वाली ना-इंसाफी और ऐसा ओछा व्यवहार करने वाले के खिलाफ मोर्चा खोलती नज़र आएँगी।

कविता पढ़ने के लिये कृपया इस लिंक पर क्लिक करें :

http://tamasha-e-zindagi.blogspot.in/2015/04/blog-post_13.html

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