गुरुवार, दिसंबर 13, 2012

नाखुश

बीते दिनों की धरोहर सन १९९८, कक्षा ११ शायद तभी लिखी थी यह कविता और उसी संकलन से एक और मोती आपके पेश-ए-खिदमत है | गौर फरमाएं....

आज मैं नाखुश हूँ खुद से
भटक गया हूँ अपनी मंजिल से
आज मैं भटक गया हूँ अपनी राहों से
भूल गया हूँ वो मार्ग
जिसकी आकांशा कुछ लोग करते थे मुझसे
लेकिन कसूर सिर्फ मेरा नहीं है
वो भी इसमें शामिल हैं
मैं बचपन से जीतता आया था
उनका प्यार पाता आया था
लेकिन
जब एक बार गया हार
सहनी पड़ी सब की दुत्कार
मन को शांत करने के लिए
मैं ढूँढने लगा मार्ग
लेकिन वो मार्ग मुझे कहाँ ले जा रहा है
ये मैं नहीं जानता हूँ
आज मैं नाखुश हूँ खुद से
भटक गया हूँ अपनी मंजिल से
कुछ दोस्त मिले नए
सब लगे अच्छे
उन्ही के चलते अपना कुछ
गम भुला पाया हूँ
लेकिन मेरे अपनों को मुझ पर
नहीं है विश्वास
वे नहीं करते मेरा एतबार
इसलिए मैं आज भटक गया हूँ
अपनी मंजिल से
आज मैं नाखुश हूँ जिंदगी से...


धोखा

अपने पुराने पिटारे से एक और कविता नज़र है आपके उम्मीद है पसंद आएगी...

मेरा मन कितना कहा था
मत कर तू दोस्ती
क्योंकि
बचपन से ही तू धोखा खाता आया है
लेकिन मैंने भी कर ही ली दोस्ती
हाँ तुम से दोस्ती
और आज तुम ही
ठुकरा कर जा रहे हो
मेरा मन कितना कहा था
करो न किसी से दोस्ती
लेकिन
आखिर ये दिल तुमसे लगा ही लिया
लेकिन
आज तुम भी यह दिल तोड़ कर जा रहे हो
आज पता लग रहा है
दुनिया कैसी है
कोई किसी का नहीं है
सब कुछ बस पैसा है
आज तक मैं समझता था
अभागा अपने को
लेकिन यह दुनिया तो
अभागों से भरी पड़ी है 

उलझन

आज अलमारी की सफाई करते वक्त एक पुरानी डाईरी हाथ आ गई । कुछ पुराने पल और कुछ पुरानी कवितायेँ मन मस्तिष्क में तरो ताज़ा हो गए । वही पल और यादें आपके साथ बाँट रहा हूँ अपने इस ब्लॉग पर और आपकी क्या सोच है इनके बारे में जानना चाहूँगा । यह कविता मैं कक्षा ११ में लिखी थी जब मैं बैक बेन्चेर  हुआ करता था और ज़्यादातर पेरिओड्स में सोया रहता था । या दो ऐसे ही कुछ न कुछ उट पटांग कुछ भी लिखता रहता था अपनी डाईरी में या फिर अध्यापक की रोचक किस्म की तस्वीरें बनाता रहता था । ज़्यादातर इसीलिए डांट खाता था या कक्षा से बाहर कर दिया जाता था ।

ये उम्र का कौन सा मोड है मेरे जीवन का
जिसे जितना समझना चाहता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ
कोई समझता नहीं है मुझे
मेरी भावनाओं को
यह कौन सा मोड है
मेरे जीवन का
जिसे जितना समझता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ

कोई काम करो, तो बड़े हो गए हो
दूसरा कोई करना चाहो तो, अभी बहुत छोटे हो
चारों तरफ से मिलती हैं नसीहतें
यह दुनिया मुझे समझती क्यों नहीं ?
कितना भी समझाओ
कुछ समझना ही नहीं चाहती है

ये उम्र का कौन सा मोड है मेरे जीवन का
जिसे जितना समझना चाहता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ

तलाश

हे इश्वर
हर मानव
अपने अधिकारों को
बचाने के लिए
क्या दूसरों की
आत्मा का
हनन करता है ?

या फिर अपनी
झूठी शान, अहंकार
और घमंड के लिए
अपने ही खून का खून
करने को तयार रहता है ?
क्या उम्र भर
सबके अधिकार
उसमें सिमटे रहेंगे ?
कब निकल पायेगी ?
एक सय्याद के हाथों से
एक निर्बल की जान
जिसे उसने अपनी
वसीयत में से
सिर्फ आंसू ही
के रखे हैं
जिसकी साँसे तक
सय्याद के पास
क़ैद हैं

अब जीवन किसी की
क़ैद से मुक्त
खुले आकाश में
विचरते पक्षी की तरह
उड़ना चाहता है
अनंत जीवन की
तलाश में
फिर वापस
एक सुन्दर संसार
एक सुन्दर घर
जो मानव समाज के लिए
कल्याणकारी हो
किसी सय्याद की
छाया से दूर 

बुधवार, दिसंबर 12, 2012

अतीत

ये दिल भी
मेरा है
मेरा है 'निर्जन'
एक चीख
आत्मा
ने की
एक दिल यथार्थ का
होते हुए भी
अतीत के
पुराने यथार्थ
को खींच
लाया
मेरे समक्ष
क्या अतीत
ज्यादा सुखद था ?
क्या अतीत ज्यादा कोमल था ?
तभी तो चिपका रहा
मुझ से
पुराने रोग की भांति
एक समय  से
दूसरे समय तक
ये रोग (स्मृतियाँ)
किस प्रकार का है ?
नहीं जानता
नहीं जानता
पर रोग अब
बहुत पुराना होने पर भी
पुराने अन्न की भांति
अधिक पचन
शक्ति वाला
प्रतीत होता है
या मुझे
अच्छा  लगता है
मेरी भ्रान्ति
आत्मा को
भ्रमित किये हुए है ??

महक

ये संकरी गलियां
क्यों
मुग़ल उद्यान की
सुगंध की तरह
अपने में
खींचे चली
जाती है
नहीं जानता था
जब तक
तब भी
एक शराबी
के बहके
क़दमों की
भांति
उस पर दौड़ा
चला जाता था
वो अपरिचित
सुगंध
किसकी है
वो मेरे
बिछुडे हुए
अतीत के
गुलिस्तान की
महक है

तू ही है

आब-ए-चश्म भी तू ही है
दरीचा-ए-फ़िरदौस भी तू ही है
मेरे दिल-ए-बेहेश्त की हूर भी तू ही है
तूने मेरे जज्बातों की सदाक़त को न पहचाना
अब मेरी रफ़ाक़त को तरसती भी तू ही है
इश्किया मफ्तूनियत से गुज़र किसका हुआ है 'निर्जन'
चांदनी शब् में
सितारों से सजी
पालकी में झूमते अरमान लिए
तू मेरे और करीब आ जाएगी
महकते जज़बातों के फरमान लिए
रहीम-ओ-करीम तू ही है
दिल-ए-हबीब तू ही है
तेरे अबसार वही हैं
आरिज़ भी वही हैं
तेरे सिफ़त भी वही हैं
तेरी खराबे भी वही हैं
तेरी लफ्फाज़ी का लहज़ा-ए-तरीक़ा भी वही है
जो अलफ़ाज़ कहे थे मेरी तन्हाई पे तूने
मेरे फ़वाद पे आज तलक नक्श वही हैं
तू ही है जिसने दिए दर्द-ए-दिल्दोज़ मुझे
विसाल-ए-यार-ए-इज्तिरात में बन आब-ए-तल्ख़
दीद से मेरे बरसा भी वही है....

[आब-ए-चश्म - tears;
दरीचा-ए-फ़िरदौस - window to paradise;
दिल-ए-बेहेश्त - hearty paradise and heaven;
हूर - beautiful woman of paradise;
जज्बातों - feelings;
सदाक़त - sadness;
रफ़ाक़त - closeness;
इश्किया - love and excessive passion;
मफ्तूनियत - madness;
चांदनी -  moonlight;
शब् -  night;
गुज़र - a living;
रहीम-ओ-करीम - kind and generous;
दिल-ए-हबीब - heartly beloved;
अबसार - eyes;
आरिज़ - lips;
सिफ़त - talents;
खराबे - craziness;
लफ्फाज़ी - talktiveness;
लहज़ा - accent, tone;
तरीक़ा - manner, style;
अलफ़ाज़ - words;
फ़वाद - heart;
नक्श - mark;
दर्द-ए-दिल्दोज़ - heart piercing pain;
विसाल-ए-यार - meeting/union with beloved;
इज्तिरार - helplessness;
आब-ए-तल्ख़ - tears;
दीदः - eyes;]

रविवार, दिसंबर 09, 2012

Laud Someone Home

Today i am expatiating
During the wee hours
Of todays' chilling sunday winters
I am actually thinking nothing

My mind is totally empty
My heart is totally filled with affliction
But still i miss someone
Maybe that smile
The way they fills my soul with prosperity

Years have gone past
That have made my heart and myself
Grow despondent

May be someone out there
Can put it back together
I really miss those days
I really miss those people
I really miss the ways
They make me laugh and smile

My real smile
Is now buried under
My big shoddy laugh
But i know that
There is someone 
Still out there 
Have been on the 
Long, 
Flinty road 
To my heart
And 
Will peer at the stars

And i will 
Laud that someone home

शनिवार, दिसंबर 08, 2012

मैं भी शायद जल्द ही गिर जाऊँगा

इन सर्दियों की सियाह रातों में
आज
मैं देख सकता हूँ
अपने अतीत के अवशेषों को
आंसू बह कर गिरते हैं
मेरे गालों से
वैसे मैं भी शायद
जल्द ही गिर जाऊँगा

अगरचे केवल तकदीर ने
मेरे लिए यह चुना है
तो एक बार फिर
मैं तकदीर से लडूंगा
और फिर से एक
आज़ाद मौत मर जाऊंगा
अपनी ख्वाइशों को
बंदिशों में बांध कर
और सिसक सिसक कर
जिंदगी बिताना 
क्या इस तरह जीने को
जिंदगी कहते हैं ?
क्या इस तरीके से
जीवन जीना मैंने चुना है ?
अपने सपनो के लिए
अपनों के लिए
मर मिटना
और दिल मैं कोई
अफ़सोस न रखना
यही मेरे जीने का मकसद है
कोई भी इस उत्साह
कोई इस उमंग को
मुझ से छीन नहीं सकता
मेरे मज़बूत इरादों को
अब कोई तोड़ नहीं सकता
चाहे अरमानो के
खून की नदियाँ बह जाएँ
चाहे मुस्कराहटों पर
अँधेरा छा जाये 
चाहे जिंदगी तीरों की बौछार करे
या फिर गोलियों की बारिश
अपनी जिंदगी की आखरी जंग
मैं मरते दम तक लड़ता रहूँगा
जब तक सांस में सांस है
जिंदगी
तेरे से ऐसे ही भिड़ता रहूँगा
पर आज
आंसू बह कर गिरते हैं
मेरे गालों से
वैसे मैं भी शायद
जल्द ही गिर जाऊँगा

गोकि हारने का गम
अब दिल से जाता रहा
जिसपे रोता हूँ
वो हालात नज़र आता रहा
वो लोग जिन पर
दिल-ओ-जां लुटाए थे कभी
वो नासूर बनकर चोट करते हैं अभी
फिर भी लड़ना तो मुझे है
आखरी दम तक मेरे
इसलिए मैं, मैं हूँ
और यही है तरीका मेरा
हथियार डालूँगा नहीं
है खुद सी ही
यह वादा मेरा
पर आज
आंसू बह कर गिरते हैं
मेरे गालों से
वैसे मैं भी शायद
जल्द ही गिर जाऊँगा

अगर कभी मैं स्वर्ग पाउँगा 
तो उन लम्हों को जीना चाहूँगा
जिंदगी के वो पल
जो कहीं खो गए हैं
जिनमें मेरे मिजाज़ के अनुकूल
लम्हे हुआ करते थे
जिन्हें मैं जीता था
और
हमेशा जीना चाहता था
पर अब वो पल
शायद ही वापस आयेंगे
पर सोचने में क्या जाता है
कोई न कोई तो है
जो उन्हें
खुद ही वापस लौटाएगा 
पर आज
आंसू बह कर गिरते हैं
मेरे गालों से
वैसे मैं भी शायद
जल्द ही गिर जाऊँगा

आखरी दरवाज़ा सिर्फ एक ही है
वो सिर्फ जीत की दस्तक देता है
आगे आने वाली पीढ़ी को
यह बात दीगर है के पीढ़ी
मेरी हो या किसी और की
खुद से लड़ कर
खड़े होने की प्रेरणा देता है
आज मेरे सपने शायद हार जाएँ
मेरी उम्मीदें ध्वस्त हो जाएँ
मेरे होंसलें पस्त हो जाएँ
पर अंत में तो विजय ही है
विचारधारा कभी हार नहीं सकती
पर आज
आंसू बह कर गिरते हैं
मेरे गालों से
वैसे मैं भी शायद
जल्द ही गिर जाऊँगा

कल कुछ लोग देख्नेगे
मेरी जीत के जश्न को
वो एक बेहतरीन पल होगा
जब मैं जीतूंगा और
वो हार जायेंगे
मैं खड़ा रहूँगा सामने
स्वाभिमान
आत्मसम्मान
गौरव
और मानसम्मान
के साथ
वो वक्त तो ज़रूर आएगा
इतना तो मालूम है मुझे
बेशक मैं गिर जाऊंगा
पर मेरे होसलों को कोई
छु भी नहीं पायेगा
पर आज
आंसू बह कर गिरते हैं
मेरे गालों से
वैसे मैं भी शायद
जल्द ही गिर जाऊँगा

इन सर्दियों की सियाह रातों में
आज
मैं देख सकता हूँ
अपने अतीत के अवशेषों को
आंसू बह कर गिरते हैं
मेरे गालों से
वैसे मैं भी शायद
जल्द ही गिर जाऊँगा

गुरुवार, दिसंबर 06, 2012

Game Called Life

I'm not very good
At this Game called Life
For I've not learned to see children crying
Without feeling pain
For I've not learned to watch animals destroyed
Without wondering why
For I've not yet met a king or a celebrity
That I would bow down to
Or a man so insignificant
That I would use for a stepping-stone
For I've not learned to be a 'yes man'
To narrow minded bosses
Who quote rules without reason
And I've not learned to manipulate
The feelings of others
To be used for my own advantages
Then cast aside as I see fit
No, I'm not very good
At this Game called Life
And if everything goes well
Maybe I never will be...


These lines are not mine. Read them somewhere and really liked them because they relate to me, my feelings and my thinking. It seems that there is someone somewhere who is like me. So just published them on my blog. 

In My Dreams

I hear her whispers in my ears in my dreams
I hear her murmuring my name when i love her in my dreams
I hear her moans and groans in my dreams
I hear her saying make love to me in my dreams
I hear her telling me that i am the only one for her in my dreams
I hear her everyday and i love it so much

I see her falling into my arms in my dreams
I see her glowing face lightning up my darkness in my dreams
I see her fighting my problems in my dreams
I see her wiping off my tears in my dreams
I see her facing my fears in my dreams
I see her everyday and i love it so much

I smell her body fragrance, as i hold her in my dreams
I smell her hair conditioner, as i hug her in my dreams
I smell her mouthwash, as i kiss her in my dreams
I smell her excitement, as she cuddle in me in my dreams
I smell her aroma, as she looses herself in my arms in my dreams
I smell her everyday and i love it so much

I feel her fingers in my hair in my dreams
I feel her hot breath on my neck in my dreams
I feel her body pressed so close to mine in my dreams
I feel her lips on my throat in my dreams
I feel her hands move on my body in my dreams
I feel her everyday and i love it so much

I taste her lips in my dreams
I taste her tongue in my dreams
I taste her moistness in my dreams
I taste her salts in my dreams
I taste her love, passion and kisses in my dreams
I taste her everyday and i love it so much

I hear her in my dreams
I see her in my dreams
I smell her in my dreams
I feel her in my dreams
I taste her in my dreams
I do all this everyday and i love it so much

I am finally with her
She is finally with me
I love this so much
I love her all my life
Till i die, Till i die.

बुधवार, दिसंबर 05, 2012

मुझे नफरत है खुद से

मुझे नफरत है खुद से, उस सब के लिए जो मैंने आज तक किया
मुझे नफरत है खुद से, जिंदगी जीने के कोशिश करने के लिए
मुझे नफरत है खुद से, अपने जज़्बात दिखने के लिए
मुझे नफरत है खुद से, प्यार करने की कोशिश करने के लिए

मुझे नफरत है खुद से, इस कामोन्माद में जलने के लिए
मुझे नफरत है खुद से, जो कुछ भी मैं हूँ उसके लिए
मुझे नफरत है खुद से, अपने आँखों को आंसू देने के लिए
मुझे नफरत है खुद से, खुद खड़ा होने की कोशिश के लिए

मुझे नफरत है खुद से, अपने वादों को पूरा न कर पाने के लिए
मुझे नफरत है खुद से, अपने अपनों को दुखी देखने के लिए
मुझे नफरत है खुद से, अपने एहसासों को मार देने के लिए
मुझे नफरत है खुद से, अपने कर्मों को पूरा न कर पाने के लिय

मुझे नफरत है खुद से, जो कुछ बदल नहीं सकता
मुझे नफरत है खुद से, अपनी जिंदगी जीने से
मुझे नफरत है खुद से, खुदखुशी के विचारों से
मुझे नफरत है खुद से, अपने डर के एहसासों से

मुझे एहसास है, मैं जकड़ता जा रहा हूँ
अपनी खुद की नफरत में
एहसास है उस खुदा के ठन्डे हाथ का
एहसास है उसकी कठोर पकड़ का
एहसास है उसके निकृष्टतर मिजाज़ का
उसने मुझे एक खुश मिजाज़ जिंदगी से
उठा कर इस अकेली सडन भरी मुर्दा जिंदगी में ला पटका

मुझे नफरत है इस जिंदगी की वजह से
मुझे नफरत है अपने इस छुपने की वजह से
मैं सच में यही सोचता हूँ, इससे अच्छा तो मौत मिल जाये
ऐसी बेनाम, रूखी, बेनूर, बेकार, सूनी, अकेली, लाचार, अत्याचारी जिंदगी से तो बेहतर
मौत क्यों न आ जाये, मौत क्यों न आ जाये, मौत क्यों न आ जाये

एहसास

जिंदगी रेत की तरह
हाथों से फिसल रही है
हर एक लम्हा बीत रहा है
तेरी यादों में
बिना जाने किस तरह
तुझको चाहूँ मैं
किस तरह से तेरी
उन सोई पलकों को
छु लूं मैं

सपने बदल रहे हैं यहाँ
तेरे साथ पाने को बेताब है रात

किसी सूखे दरख़्त के नीचे
छनते सूरज की गर्माहट

साँसों का हौले से आना जाना
एक कब्र खोद रहा हूँ मैं
अपने माज़ी की
तेरे साथ अपने मुस्तकबिल की
और खुद की भी

इतनी जल्द
इतनी तेज़ी से

कुछ पूर्वाभास
या मेरी किस्मत
या सब कुछ जो है
वो मतलब से है

ओझल कभी कुछ नहीं होता
अपना नामोनिशां छोड़े बिना

अपनी हथेलियों पर निराशा लिए
शायद अब नाच भी नहीं सकता
बिना नीचे गिराए उसे

नीचे जिंदगी के गलीचे पर 
कहीं रिस कर
उनमें न समां जाये

पर तेरे हाथ में देखा है
मैंने
मेरी जिंदगी को सोकने के लिए
वो सफ़ेद तौलिया
और वो तेरी हंसी की आवाज़
जैसे कागज की चिड़ियाँ
चहक रही हों शाखों पर
और वो पेड उग रहा है
मेरे दिल से

ये एक एहसास
दम तोड़ रहा है
धीरे धीरे...

मंगलवार, नवंबर 27, 2012

मुझे नफरत है के मैं तुम्हे प्यार करता हूँ...

मुझे नफरत है के तुम
मेरे हर ख्याल में रहती हो
मेरी सुबह तुम्हारे साथ होती है
मैं सोता हूँ तुम्हारी हंसी को सोच कर

मुझे नफरत है के मैं
तुम्हे इतना पसंद करता हूँ
तुम्हारी सुन्दर आँखें
तुम्हारे नमकीन होटों
को चखने के लिए
मैं तरसता हूँ

मुझे नफरत है
जिस तरह से तुम मुझे
महसूस करने को मजबूर करती हो
जैसे मुझे तुम्हारी ज़रूरत है
जीवित रहने के लिए
जैसे तुम्हारे बिना सांस लेना
अत्यंत कष्ट दायक है

मुझे नफरत है के मैं
तडपता हूँ तुम्हारे लिए
मुझे तृष्णा है तुम्हारे स्पर्श की
हर लम्हा
हर दिन

मुझे नफरत है
जिस तरह से मैं तुम्हे
चाहता हूँ
अपने अधम ह्रदय
के हर एक धडकन के साथ
तुम्हे चाहना
मुझे जीवित रखता है
फिर भी अकेला रखता है मुझे....

समाज नाज़ेबा है...मैं नहीं

समाज नाज़ेबा है
मैं नहीं

सुंदरता परिभाषित होती है
हमारे व्यवहार से
नाकि पैमाना पर खुदे अंकों से

भूखे रहना काम नहीं करता
परिष्करण काम नहीं करता
गोलियाँ काम नहीं करती

जो इंसान का अक्स
तुम देखते हो
आईने में
संपूर्ण है वो
हर तरह से
जिस तरह भी वो है
अभी

अब खफा क्या होना
यदि वो खरा नहीं उतरा
आपकी अन्तरंग
उम्मीदों पर

उपमार्ग काम नहीं करता
रुदन काम नहीं करता
मरना काम नहीं करता

याद है मुझे
समाज नाज़ेबा है
मैं नहीं

दोस्त किसे चाहियें ?

प्यारे अकेलेपन,
क्या तुम मेरे दोस्त बनोगे ?
क्योंकि मैं देख रहा हूँ एक दौर,
मेरी दुनिया बिस्तर तक सिमट गई है |

प्यारे ग़म,
क्या तुम मुझे मेरी मुस्कान दे पाओगे ?
क्योंकि खुशियाँ मुझसे मीलों दूर हैं,
जैसे हर एक चीज़ जो मैंने सोची थी |

प्यारे निराशावाद,
क्या तुम मेरी मदद करोगे ?
क्योंकि आशाएं मेरी जिंदगी से फिसल गई हैं,
कुछ अपनों का अपनापन सह सह कर |

प्यारे कष्ट,
क्या तुम मुझे मजबूती दे पाओगे ?
क्योंकि एक तुम ही हो जो मुझे रोक पायेगा,
वो करने से जो मैंने सोचा है अरसे से |

प्यारे निधन,
क्या तुम मुझे जिला पाओगे ?
क्योंकि मैं और जीवित रहना नहीं चाहता,
ऐसे संसार में जो मेरी इतनी परवाह करता है |

प्यारे यमलोक,
क्या तुम मुझे साधू बना पाओगे ?
क्योंकि मैं योग्य नहीं हूँ, दिव्य सुखों का,
अपने कर्मों से मैं दोषी बन चुका हूँ |

प्यारे दोस्तों,
क्या तुम मुझे अपनी भावुकतापूर्ण कथा बनाओगे ?
क्योंकि आपको चाहियें अपनाअहंकार और वैभव
जिंदगी में जहाँ कभी मैं गिरा था |

मंगलवार, नवंबर 20, 2012

सर्दियों का आगाज़

बहकता हुआ मौसम
कोहरे की रात
माज़ी का वक्त
कुछ भूली बिसरी याद
वो पुकारती आँखें
वो शरारत भरा साथ
मुझे याद है अब भी उन
सर्दियों का आगाज़...

दुकान तो सजेगी ही

एक और शाम स्वाह हुई
दिल को फिर से गम् हुआ
एक नया दिन फिर आ गया
हर रोज की तरह
इन्तेज़ार जिसका था
वो नहीं आया
हमेशा की तरह
नए दिन में
फिर से सज गई
कुछ उम्मीदों और अरमानो की दुकान
अब और क्या कहूँ
उसूल है कारोबार का
कोई आये या न आये
दुकान तो सजेगी ही
दुकान तो सजेगी ही...

रविवार, नवंबर 18, 2012

What do you want ?

She once asked me
What do you want?


Today i found the answer
...What do I want?

I want to hug you

I want to kiss you
I want to miss you
I want to love you
Like you say you love me.

I want to please you,
as I am a beauty pleaser.
How could I possibly say no?
You're here in my thoughts,
hurting & fighting with your life.

I don't know who I am -
God knows who I am.
If only he could reign his truth
upon my soul.

If only, then I could tell you
what I truly want.

He Said...

Maybe it won't go away, he said.
Maybe it won't end.
Maybe you'll go on out your life;
Maybe you'll always wonder.

You can't just shake it off, he said.
You can't make yourself forget.
You can't shut down your heart;
You can't by yourself, he said.

One day you'll be grown, he said.
One day you'll look back.
One day it might make sense;
Some days it still won't.

Make a choice, he said.
Make it count.
Make yourself better.
Make her a ghost of the past.

But what if, I said,
But what if I can't?
But what if I cry?
But what if I die?

He said, look to God.
He said, look to me.
He said a lot of things
That he didn't really mean.