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गुरुवार, मार्च 26, 2015

एक सवाल ?


















सांस लेना
प्रार्थना करना
बोलना
खाना
पीना
उठना
बैठना
हँसना
रोना
नाचना
गाना
पढ़ना
लिखना
लड़ना
बहस करना
खेलना
काम करना
कलाकारी
रंग भरना
प्यार करना
शोक करना
चोट लगना
खून बहना

जीना
मरना

यह समस्त प्राणीयों में
स्वाभाविक है

'निर्जन' प्रश्न सभी से यही कि
जाति,
रंग,
ऊँच,
नीच,
कामुकता,
धर्म,
लिंग,
के आधार पर
हम आपस में
एक दुसरे को
इतना अलग कैसे करते है ?

--- तुषार राज रस्तोगी ---

शनिवार, मार्च 07, 2015

होली हो ली













होली
रंग बिरंगी
हो ली
मन मस्तिष्क को
रंगती हुई, आई
जीवन की होली
एक दिन हुई
होली में जीवन
एक दिन मिला
खुश हो गए
माता-पिता
बंधू बांधव
पर आज पुराने
जीवन की होली
फिर से खेली
नए बंधू के साथ
मौज मस्ती
की छीटें
सिन्धु से, ये
तकदीर का
तमाशा है 'निर्जन'
एक नट की तरह

--- तुषार राज रस्तोगी ---

रविवार, फ़रवरी 22, 2015

होली की सौगात













इस होली मिलकर चलें
अपनाएं प्रेम की राह
जीवन का स्वागत करें
दिल की यही है चाह
ग़म हो जाए उड़न छू
उन्नति के भर लें रंग
जीवन को प्रेम प्रमाण दें
अपनों को लेकर संग
प्रभु को हम भूलें नहीं
रोज़ करें गुणगान
त्यागें आलस्य सभी 
नित्य दें कर्म पर ध्यान
बातें करें धर्म की सदा
करें अपनों का मान
प्रेम से जियें सभी तो
बढ़े आन और शान
छोड़ जात-पात का भेद
स्नेह बंधन में बांधें सबको
करें एक दाता की बात
जो जीवन देता है सबको
साथ मिल जुल कर बैठें
करें ख़ुशी से अठखेलियाँ
घर आंगन स्वर्ग बन जायेगा
एकता का मंदिर कहलायेगा
वृद्ध युवा बालक बंधू सभी
साथ मिलकर धूम मचाएं
हर एक कोने में हो शोर
खुशियों से घर जाए झूम
खिल जाए तिनका तिनका
जब प्रेम की बांधें मनका
जीवन कटे सन्यासी जैसा
सच्चाई से करो बरजोरी
जो रूठे हैं मना लें उनको
 
यही होती है सच्ची होली
क्षण भर में हल हो जायेंगे
सब गिले शिकवे माफ़
जीवन में रंग लाएगी 'निर्जन'
होली की यही सौगात

--- तुषार राज रस्तोगी ---