आज अलमारी की सफाई करते वक्त एक पुरानी डाईरी हाथ आ गई । कुछ पुराने पल और कुछ पुरानी कवितायेँ मन मस्तिष्क में तरो ताज़ा हो गए । वही पल और यादें आपके साथ बाँट रहा हूँ अपने इस ब्लॉग पर और आपकी क्या सोच है इनके बारे में जानना चाहूँगा । यह कविता मैं कक्षा ११ में लिखी थी जब मैं बैक बेन्चेर हुआ करता था और ज़्यादातर पेरिओड्स में सोया रहता था । या दो ऐसे ही कुछ न कुछ उट पटांग कुछ भी लिखता रहता था अपनी डाईरी में या फिर अध्यापक की रोचक किस्म की तस्वीरें बनाता रहता था । ज़्यादातर इसीलिए डांट खाता था या कक्षा से बाहर कर दिया जाता था ।
ये उम्र का कौन सा मोड है मेरे जीवन का
जिसे जितना समझना चाहता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ
कोई समझता नहीं है मुझे
मेरी भावनाओं को
यह कौन सा मोड है
मेरे जीवन का
जिसे जितना समझता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ
कोई काम करो, तो बड़े हो गए हो
दूसरा कोई करना चाहो तो, अभी बहुत छोटे हो
चारों तरफ से मिलती हैं नसीहतें
यह दुनिया मुझे समझती क्यों नहीं ?
कितना भी समझाओ
कुछ समझना ही नहीं चाहती है
ये उम्र का कौन सा मोड है मेरे जीवन का
जिसे जितना समझना चाहता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ
ये उम्र का कौन सा मोड है मेरे जीवन का
जिसे जितना समझना चाहता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ
कोई समझता नहीं है मुझे
मेरी भावनाओं को
यह कौन सा मोड है
मेरे जीवन का
जिसे जितना समझता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ
कोई काम करो, तो बड़े हो गए हो
दूसरा कोई करना चाहो तो, अभी बहुत छोटे हो
चारों तरफ से मिलती हैं नसीहतें
यह दुनिया मुझे समझती क्यों नहीं ?
कितना भी समझाओ
कुछ समझना ही नहीं चाहती है
ये उम्र का कौन सा मोड है मेरे जीवन का
जिसे जितना समझना चाहता हूँ
उतना ही उलझ जाता हूँ