मंगलवार, अगस्त 03, 2010

खुशियों के चार पल















खुशियों के चार पल, मैं सदा ढूँढता रहा
क्या ढूँढना था मुझको, मैं क्या ढूँढता रहा

बेईमानों के शहर में, मैं अदना सा शख्स़
लेने को सांस थोड़ी, बस हवा ढूँढता रहा

मालूम था के उसकी, नहीं है कोई रज़ा
फिर भी मैं वहां, उसकी रज़ा ढूँढता रहा

मालूम था कि मुझे, नहीं मिल सकेगा वो
फिर भी मैं उसका, पता सदा पूछता रहा

फिर यूँ हुआ के उस से, मुलाक़ात हो गई
अब ताउम्र 'निर्जन', अपना पता पूछता रहा

--- तुषार राज रस्तोगी ---

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना हेतु बधाई तुषार भाई

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  2. निर्जन का मन निर्जन लग रहा
    इच्छायें निर्जन ना रहे ....
    आमीन .....

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  3. सोच को शब्द देने में आप बहुत सक्षम हैं, आपकी उपरोक रचना बहुत ही आला दर्जे की है, आपको बधाई है तुषार भाई।

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  4. वाह बहुत सुंदर रचना
    बधाई

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही सुंदर रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत ही उम्दा रचना तुषारजी!

    जवाब देंहटाएं

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