बुधवार, अप्रैल 20, 2016

वो दुर्गा बनती रही

उसको ज़मी पर रौंदता
वहशीपन जब रगों में कौंधता

करती रही कोशिशें सभी
रोती बिलखती सिसकती तभी

वस्त्र कर उसके तार तार
अस्मिता पर करता रहा वो प्रहार

लड़-लड़ चलाये हाथ और लात
भिड़ती गई कुछ तो हो एहसास

चीखता रहा वो उस पर तब भी
चिचियती रही वो भयभीत सी

कलाई जकड़ निचोड़ दीं उसकी
मौन छटपटाती व्यथित नज़रें उसकी

जान जितनी बची थी डाल दी
मिटाने को कहानी उस काल की

जूँ तक ना रेंगी उसके कान पर
रोके रुका ना वो जंगली जानवर

गिड़गिड़ाती रही करहाती रही
अहम् को ठहरता रहा वो सही

चेहरे पर था उसके वो मारता
हवस को था अपनी वो सहारता

मुहं उसका हाथों से ढांपता
रोम रोम था उसका फिर काँपता

इससे पहले वो कुछ कह पाती ज़रा
ज़हर उसने था यौवन में उसके भरा

बेशर्मी कुकर्मी फिर उठ भी गया
लड़खड़ाता दरवाज़े तलक बढ़ता गया

छोड़ अधमरा अकेला नाज़ुक जां को
पटक कर दरवाज़ा वो चलता बना

बैठी सिकुड़ी कोने में वो जलती रही
एक आशा की लौ फिर भी बलती रही

शायद कोई आएगा मरहम ले हाथ में
लगाकर गले ले जायेगा उसे साथ में

टूटकर अधूरे सपनो में बिखरती रही
हर एक आहाट पर वो सिहरती रही

पीड़ा आंसू बन आँखों से छनती रही
तेज़ाब-इ-अश्क़ से वो दुर्गा बनती रही

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