रविवार, अगस्त 09, 2015

लघुकथा: बैसाखियाँ

किसका समय कब बदल जाए किसको को कुछ मालूम नहीं होता। आज गोविन्द असहाय है और अपनी लाचारी पर अक्सर मलाल करता है। कल तक जो हवा में उड़ा फिरता था आज ज़मीन पर रेंगने लायक भी नहीं रहा। एक हादसा उसकी दोनों टाँगे छीन ले गया। बड़ी ही मुश्किल से वो आज बैसाखियों के सहारे अपने जिस्म को आगे धकेल पाने की जद्दोजहद में लगा रहता है। आदत नहीं थी ना और ना कभी सोचा था कि जीवन में यह दिवस भी देखना होगा।

अभी कल की ही तो बात लगती थी जब वो अपने कॉलेज के मुख्य द्वार के सामने बैठने वाले एक बेचारे दुकानदार की खिल्ली उड़ाया करता था और उसको लंगड़ा कहकर पुकारा करता था। कई दफ़ा दुत्कार कर या अपनी मोटरसाइकिल उस पर चढ़ाने का झांसा देकर उसे बे-इज़्ज़त और डराया-धमकाया भी करता था। इसपर भी जब उसका दिल परेशान करने से ना मानता तो उसकी पुरानी बैसाखियाँ छिपा दिया करता या लेकर भाग जाया करता और वो बेचारा बैठा घंटो इसके लौटने की बाट जोहता रहता परन्तु आज समय की लाठी की गाज ने उसे गूंगा कर दिया था। वो बैसाखियों पर चलता तो जा रहा था पर ये नहीं मालूम था किधर जाना है। अपनी मानसिक उधेड़बुन से लड़ते हुए वो घर से दूर सड़क के किनारे पहुँच गया था। हर तरफ़ शोर और वाहनों का शोर मचा था। वो सड़क पार करे तो कैसे? यही सोच कर बड़ी देर से चिंतित खड़ा था। कल जो मानसिक रूप से अपाहिज था आज वो देह से भी विकलांग हो गया था और लाचार था। तभी एक भले मानस से मदद का हाथ बढ़ाया और सड़क पार करा दी।

सड़क तो पार कर ली पर मस्तिष्क में उथल-पुथल कायम थी। अपनी पुरानी ज़िन्दगी के कुछ बेहद बेहूदा दिनों को कोसता हुआ वो धीरे-धीरे बढ़ता तो चला जा रहा था पर कुछ अनसुलझे सवाल उसका पीछा छोड़ने का नाम तक नहीं ले रहे थे। शायद उस बूढ़े भिखारी की हाय लगी है मुझे...मैंने ज़िन्दगी में बहुत गुनाह किये हैं उसी की सज़ा मिली है मुझे शायद...मुझे ऐसा बर्ताव उसके साथ नहीं करना चाहियें था...बड़बड़ाता हुआ उसका अहसास बैसाखियों पर आगे तो चल रहा था पर नियति आज ज़िन्दगी को बहुत पीछे ले आई थी।

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