मंगलवार, सितंबर 14, 2010

The Scars of Love

do the scars of love ever really heal
do they change your mind about the way you feel
do they stay forever locked inside your mind
do they ever leave and leave the past behind
do they stay a lifetime will they ever go
do they ever heal will we ever know

सोमवार, अगस्त 30, 2010

August

What wondrous life is this I lead!
Ripe love drops about my way;
The luscious clusters of her hug
Upon me do crush her bliss;
Your soft hands mesmerizing
Into my hands themselves do reach;
Stumbling on thoughts as I pass
Ensnared with flowers, I fall in her arms.

सोमवार, अगस्त 09, 2010

अंतर की वेदना



















अंतर की वेदना का
कोई अंत नहीं

दुःख की संयोजना का
कोई पंथ नहीं

जो मेरा है
वो मेरा सर नहीं

जिसमें जीवित हूँ
वो मेरा संसार नहीं

रक्त रंजित अधर हैं
फिर भी मैं गा रहा हूँ

रुधिर बहते नयन हैं
फिर भी मुस्करा रहा हूँ

व्यक्त हूँ अव्यक्त हूँ
आक्रोश हूँ पर मौन हूँ

सत्य सह मैं
सत्य पर मिथ्या रहा हूँ

अंतर की वेदना का
कोई अंत नहीं अब

'निर्जन' जो होता है
अभिव्यक्त समक्ष वो

सहता ही जा रहा हूँ
सहता ही जा रहा हूँ

--- तुषार राज रस्तोगी ---

मंगलवार, अगस्त 03, 2010

अब जहन में नहीं है क्या नाम था भला सा...











 
बरसों के बाद देखा, एक शक्श दिलरुबा सा
अब जहन में नहीं है, क्या नाम था भला सा

तेवर खींचे खींचे से, आँखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी, लहजा थका थका सा

अलफ़ाज़ थे के जुगनू, आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में, नहरों का रास्ता सा

ख्वाबों में ख्वाब उस के, यादों में याद उसकी
नींदों में घुल गया हो, जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये, कितने ही ज़िन्दगी में
वो हर वजह से लेकिन, औरों से था जुदा सा

अगली मोहब्बतों ने, वो नामुरादियाँ दी
ताज़ा रफ़ाक़तों से, था दिल डरा डरा सा

तेवर थे बेरुखी के, अंदाज़ दोस्ती सा
वो अजनबी था लेकिन, लगता था आशना सा

कुछ यह के मुद्दतों से, मैं भी नहीं था रोया
कुछ ज़हर में बुझा था, अहबाब का दिलासा

फिर यूँ हुआ के सावन, आँखों में आ बसा था
फिर यूँ हुआ के जैसे, दिल भी था आबला सा

अब सच कहूँ तो यारों, 'निर्जन' खबर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत, एक वाकेया ज़रा सा

बरसों के बाद देखा, एक शक्श दिलरुबा सा
अब जहन में नहीं है, क्या नाम था भला सा

--- तुषार राज रस्तोगी ---

खुशियों के चार पल















खुशियों के चार पल, मैं सदा ढूँढता रहा
क्या ढूँढना था मुझको, मैं क्या ढूँढता रहा

बेईमानों के शहर में, मैं अदना सा शख्स़
लेने को सांस थोड़ी, बस हवा ढूँढता रहा

मालूम था के उसकी, नहीं है कोई रज़ा
फिर भी मैं वहां, उसकी रज़ा ढूँढता रहा

मालूम था कि मुझे, नहीं मिल सकेगा वो
फिर भी मैं उसका, पता सदा पूछता रहा

फिर यूँ हुआ के उस से, मुलाक़ात हो गई
अब ताउम्र 'निर्जन', अपना पता पूछता रहा

--- तुषार राज रस्तोगी ---

सोमवार, अगस्त 02, 2010

ये रात
















अलग सा एहसास, दिलाती है ये रात
दिलासा देती है, पास बुलाती है ये रात
लिपट के सोने को जी करता है इसके साथ
हालात हैं कि दिन की रौशनी से डरता हूँ
डर लगता है कि टूट न जाएँ ये हसीं ख्वाब
डर लगता है कि कोई मुझे यूँ देख न ले
देख ना ले कि मैं आज भी अकेली है मेरी रात 
तेरी याद है बस वक़्त गुज़ारने के लिए साथ
उम्मीद है बस दिल में यादें सँवारने के लिए पास
कभी तो मिलेगी कहीं तो मिलेगी वो मुझसे
यकीन अपने से ज्यादा 'निर्जन' उस पर क्यों है ?
आकर देख ज़रा कि भरोसा ज्यों का त्यों है
अलग सा एहसास दिलाती है यह रात